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जानिये रत्न ज्योतिष उपाय के बारे में !

ग्रह के रत्न हमेशा कार्य नही करते, यह रत्न तभी काम करेंगे जब आपकी कुंडली में क्षमता होगी। जैसे अगर कुण्डली में उपस्थित शनि काम काज में प्रगति देने में सक्षम होगा तो उसका रत्न लाभ देगा, लेकिन अगर शादी के लिए शनि का रत्न पहनेंगे तो कोई फर्क नही होगा। इसीलिए कुण्डली विश्लेषण और ग्रह शक्ति का आंकलन करना जरुरी होता है। सामान्य रूप से निम्न रूप से ग्रहों और उनके रत्नों का उपयोग किया जाता है, लेकिन कुण्डली विश्लेषण करवाना अधिक जरुरी है। ★ माणिक - सूर्य सरकारी नौकरी, दवाएं, स्वास्थ्य, हड्डी, दांत, नाम, यश, मुकदमा, पुलिस, विवाद ★ मोती - चंद्र स्वास्थ्य, मानसिक शांति, संपत्ति, स्थायित्व, यात्रा, निंद्रा, विवाद निपटारा ★ मूंगा - मंगल विवाद, मानसिक शांति, विवाह, घरेलू शांति, वास्तु दोष/ भूमि दोष में कमी, व्यापार में बढ़ोत्तरी, कर्ज में कमी, ऋण मुक्ति, निर्माण कार्य, कमिशन के कार्य, दुर्घटना से रोकथाम ★ गोमेद - राहु विवाद से मुक्ति, गुप्त शत्रु से मुक्ति, प्रतिष्ठा और नाम में वृद्धि, प्रसिद्धि, धन बढ़ोत्तरी, खानपान के व्यापार के अलावा अन्य सभी व्यापार के बढ़ोत्तरी में सहायक, बुद्धि का विकास, प्रतियोगिता में सफलता, विवाह, निर्माण कार्य ★ पुखराज - गुरु विवाह, स्वास्थ्य, संतान, काम काज में बढ़ोत्तरी, नौकरी में बदलाव, नई नौकरी, दुर्घटना मुक्ति ★ नीलम - शनि नौकरी, ऋण, स्वास्थ्य, विवाद, कोर्ट केस, मानसिक शांति, लम्बी बीमारी, निर्माण कार्य, स्थिर नौकरी ★ पन्ना - बुध मानसिक विकास, बौद्धिक विकास, काम काज में बढ़ोत्तरी, व्यापार के लिए आवश्यक, वित्तीय कार्य, मीटिंग, लीडर, प्रेम, विवाह, चर्म रोग, पैसो के लेनदेन के कार्य, शेयर मार्केट ★ लहसुनिया - केतु गुप्त शत्रु से मुक्ति, गंभीर रोग मुक्ति, ज्योतिष, ज्ञान, तंत्र मंत्र रक्षा, मानसिक शांति, पारिवारिक विवाद, विवाह विच्छेद, जल्दी धन प्राप्ति, अधिक प्रसिद्धि, लेखन कार्य ★ हीरा - शुक्र विवाह, संतान, शेयर मार्केट, व्यापार, विलासिता के कार्य, बड़े कार्य, अधिक धन प्राप्ति एवम् स्थिरता, रोग मुक्ति, गंभीर रोग, धार्मिक कार्य, ज्योतिष, तंत्र मंत्र रत्न सलाह व रत्न रिपोर्ट के लिए 07999845039 पर संपर्क किया जा सकता है। रत्न को मंत्रो से सिद्ध करके और कुण्डली के अनुसार तैयार करके ही उपयोग करना सही रहता है।। ■ ■ ■ ■ If you are interested in writing articles related to astrology then do register at – https://astrolok.in/my-profile/register/ or contact at astrolok.vedic@gmail.com
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जानिए मंगलवार के दिन किन ज्योतिष उपाय से आपका दिन होगा मंगलमय !

ॐ हनुमते नमः.. जन्मपत्री मे मंगल ग्रह (मंगलवार, हनुमान जी वार) धैर्य, पराक्रम, साहस, शक्ति, क्रोध, उत्तेजना, षड्यंत्र, शत्रु, विवाद, छोटे भाई, अचल संपत्ति, भूमि, क़ानूनी परेशानी तथा रक्त सम्बंधित बीमारी, कर्ज बढ़ना, शादी मे देरी का कारक ग्रह है। जन्मपत्री मे मंगल गृह पीड़ित होने पर व्यक्ति को ये परेशानी आती है। वास्तु शास्त्र मे मंगल गृह (दक्षिण दिशा) पद, प्रतिष्ठा, मानसिक शांति, स्थायित्व प्रदान करती है। घर / दुकान / ऑफिस मे दक्षिण दिशा में दोष हो, तो परिवार मे तनाव / बिखराव, धन / सम्पत्ति विवाद, कलह, बात बात पर क्रोध आना, ब्लड सम्बंधित बीमारी पर धन खर्च होना। घर / दुकान / ऑफिस में शुद्ध पारद से निर्मित संजीविनी बूटी लिए हुए हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करने से जन्मपत्री मे मंगल दोष व घर की दक्षिण दिशा के वास्तु दोष दूर होकर, तंत्र-मंत्र, नजर दोष, ऊपरी बाधाएं, पारिवारिक कलह, झगड़े से मुक्ति होकर वातावरण में सकारात्मकता का संचार होता है। मंगल के दिन सुबह लाल धागे में चार मिर्चें नीचे तथा तीन मिर्चें ऊपर और बीच में नीबू पिरोकर घर व व्यवसाय के मुख्य दरवाजे पर लगाने से नारात्मक ऊर्जा खत्म व सकारात्मकता ऊर्जा का संचार होता है। मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की सेवा महीने में किसी भी एक मंगलवार को करने से आपका मानसिक तनाव हमेशा के लिए दूर हो जाएगा। साल में एक बार किसी भी मंगलवार को अपने खून का दान करने से आप हमेशा के लिए दुर्घटनाओं से बचे रहेंगे। 5 देसी घी के रोट का भोग मंगलवार को लगाने से दुश्मनों से मुक्ति मिलती है। व्यापार में वृद्धि के लिए मंगलवार को सिंदूरी रंग का लंगोट हनुमान जी को पहनाइए। मंदिर की छत पर लगाईए लाल झंडा और आकस्मिक संकटों से मुक्ति पाइए। तेज़ और शक्ति बढाने के लिए हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, सुंदर कांड, रामायण, राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। आप मंगलवार के दिन राम मंदिर में जाएं और दाहिने हाथ के अंगुठे से हनुमान जी के सिर से सिंदूर लेकर सीता माता श्री चरणों में लगा दें, इससे आपकी मांगी हुई मनोकामना पूरी हो जायगी। प्रेत-बाधा से मुक्ति पाने के लिए शनिवार अथवा मंगलवार को शाम के समय लाल कपड़े में थोड़ा-सा सिंदूर, तांबे का पैसा और काले तिल रखकर पोटली बना कर बांध लें,फिर इस पोटली को प्रेत-ग्रस्त व्यक्ति के ऊपर से सात बार उतारकर किसी रेलवे लाइन या सड़क के एक छोर से दुसरे छोर पर फेंक दें और पीछे मुड़कर नहीं देखें साथ ही रास्ते में किसी से बातचीत नहीं करें। यदि आपका छोटा बच्चा अधिक रोता हो तो रविवार अथवा मंगलवार के दिन नीलकंठ का पंख लेकर जिस पलंग पर बच्चा सोता है उसमें लगा दें। इससे उसका रोना जल्द ही बंद हो जाएगा। Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. It is a free platform to write astrology articles. Become a part of it by registering at https://astrolok.in/my-profile/register/
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जानिये जन्मपत्री मे कैसे बनते हैं ग्रहण योग, चंडाल योग, दरिद्र योग, कलह योग

जन्मपत्री मे ग्रहो से निर्मित कुयोग (ग्रहण योग, चंडाल योग, दरिद्र योग, कलह योग, शकट योग, उन्माद योग ) की शांति / उपाय न होने पर ये शुभ ग्रहो की दशा व राजयोग का शुभ फल देने मे बाधा बनते है। ग्रहण योग... जन्मकुण्डली में किसी भी भाव में जब आत्मा कारक सूर्य या मन के कारक चंद्रमा के साथ राहू और केतु में से कोई भी एक ग्रह उपस्थित होता है तो सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण योग बनता है। जन्मपत्री मे ग्रहण योग के कारण जातक को शारीरिक-मानसिक पीड़ा, अपमान, अपनों से वैमनस्य, रोग, ऋण, शत्रु, कलंक तथा राजदण्ड आदि का सामना करना पड़ सकता है। जन्मपत्री के जिस भाव मे ग्रहण दोष हो, वह भाव भी बुरा फल देता है। चंडाल योग: बृहस्पति गृह की जन्मपत्री के किसी भी भाव में राहू या केतु से युति होने पर गुरु चंडाल योग बनता है। इस योग के कारण व्यक्ति के जीवन मे हर 2 - 3 साल बाद, कुंडली के जिसे भाव मे यह होता है। उस भाव से समबन्धित कोई न कोई रूकावट या परेशानी आती है। ऐसे ग्रहो के योग के कारण व्यक्ति को धोखा, शरीर पर कोई चोट का निशान व व्यक्ति का मन / दिमाग अनैतिक अथवा अवैध कार्यों में जल्दी लग जाता है। इस योग वाले अधिकांश व्यक्ति हिंसक, धार्मिक कट्टरवादी तथा पाखंडी व उनकी कथनी और करनी में अंतर होता है। दरिद्र योग.... यदि लग्न या चंद्रमा से सभी केंद्र स्थान रिक्त हों या सभी केंद्रों में पाप ग्रह हों तो दरिद्र योग होता है। ऐसे योग वाले इंसान को आजीवन कंगाली और बदहाली का सामना करना पड़ता है। कलह योग: जब कुण्डली में चंद्रमा किसी भी पाप ग्रह के साथ बारहवें, पांचवें अथवा आठवें भाव में मौज़ूद होकर राहु के साथ भी संयोग कर ले तो कुण्डली में कलह योग का निर्माण हो जाता है। ऐसे योग वाला जातक कलह प्रिय होता है और यदि वह स्वयं कलह का कारण न भी बने, उसके जीवन में आए दिन कलह के संयोग उपस्थित होते रहते हैं। ऐसे जातक की सारी ऊर्जा कलह से निपटने में खर्च होती रहती है। शकट योग.. कुंडली में चन्द्रमा बृहस्पति से 6 अथवा 8वें घर में स्थित हो तो ऐसी कुंडली में शकट योग बनता है जिसके कारण जातक की आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों को अपने जीवन में अनेक बार गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। उन्माद योग... (1) कुंडली मे लग्न में सूर्य हो व सप्तम में मंगल हो, (2) यदि लग्न में शनि और सातवें ,पांचवें या नवें भाव में मंगल हो (3) यदि धनु लग्न हो व लग्न- त्रिकोण में सूर्य-चन्द्र युति हों साथ ही गुरु तृतीय भाव या किसी भी केंद्र में हो तो गुरुजनों द्वारा उन्माद योग की पुष्टि की गयी है.जातक जोर जोर से बोलने वाला गप्पी होता है.ऐसे में यदि ग्रह बलिष्ट हों तो जातक पागल हो जाता है | Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. It is a free platform to write astrology articles. Become a part of it by registering at https://astrolok.in/my-profile/register/
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जानिये ज्योतिष में गर्भाधान का योग

पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज से मन सहित जीव (जीवात्मा) का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं। गर्भाधान का संयोग (काल) कब आता है ? इसे ज्योतिष शास्त्र बखूबी बता रहा है। चरक संहिता के अनुसार – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पंच महाभूतों और इनके गुणों से युक्त हुआ आत्मा गर्भ का रुप ग्रहण करके पहले महीने में अस्पष्ट शरीर वाला होता है। सुश्रुत ने इस अवस्था को ‘कलल’ कहा है। ‘कलल’ भौतिक रूप से रज, वीर्य व अण्डे का संयोग है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चंद्रमा को शास्त्रकारों ने पूर्णबली माना है। शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कलाऐं जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे स्त्री-पुरुषों के मन में प्रसन्नता और काम-वासना बढ़ती है। जब गोचरीय चंद्रमा का शुक्र अथवा गुरु से दृष्टि या युति संबंध होता है, तब इस फल की वृद्धि होती है। सफल प्रेम की डेटिंग का समय जिस समय आपकी राशि से गोचर का चंद्रमा चैथा, आठवां बारहवां न हो। रश्मियुक्त हो। शुक्र अथवा गुरु से दृष्ट या युत हो। उस समय प्रेमी या प्रेमिका से आपकी मुलाकात (डेटिंग) सफल होती है और आपकी मनोकामना पूर्ण होती है। इस मुहूर्त में आपकी पत्नी भी सहवास के लिए सहर्ष तैयार हो जाती है यह अनुभव सिद्ध है। गर्भाधान की क्रिया का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह सभी जानते हैं कि गर्भाधान करने के लिए यौन संपर्क स्थापित करना पड़ता है, किंतु पति-पत्नी के प्रत्येक यौन संपर्क के दौरान गर्भाधान संभव नहीं होता है। यौन संपर्क तो बहुत बार होता है, परंतु गर्भाधान कभी-कभी संभव हो पाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पुरुष के वीर्य में स्थित शुक्राणु जब स्त्री के रज में स्थित अण्डाणु में प्रवेश कर जाते हैं, तो गर्भ स्थापन्न हो जाता है। निषेचन की इस जैविक प्रक्रिया को गर्भाधान कहते हैं। यह प्रक्रिया स्त्री के गर्भाशय में होती है। निःसंतान दंपत्तियों (बांझ स्त्री/नपुंसक पुरुष) के लिए निषेचन की यह क्रिया परखनली में कराई जाती है। इससे उत्पन्न भ्रूण को ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ कहते हैं। इसके विकास के लिए बेबी भ्रूण को किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय में रख दिया जाता है। जिसे सेरोगेट्स या किराये की कोख कहते हैं। आयुर्वेद की दृष्टि से गर्भोत्पत्ति का कारण चरक संहिता के अनुसार – जब स्त्री पुराने रज के निकल जाने के बाद नया रज स्थित होने पर शुद्ध होकर स्नान कर लेती है और उसकी योनि, रज तथा गर्भाशय में कोई दोष नहीं रहता, तब उसे ऋतुमती कहते हैं। ऐसी स्त्री से जब दोष रहित बीज (शुक्राणु) वाला पुरुष यौन क्रिया करता है, तब वीर्य, रज तथा जीव – इन तीनों का संयोग होने पर गर्भ उत्पन्न होता है। यह जीव (जीवात्मा) गर्भाशय में प्रवेश करके वीर्य तथा रज के संयोग से स्वयं को गर्भ के रूप में उत्पन्न करता है। ज्योतिष में जीव (गुरु) को गर्भोत्पत्ति का प्रमुख कारक माना है। वीर्य, रज, जीव और मन का संयोग ही गर्भ है:- महर्षि आत्रेय मुनि ने कहा है- पुनर्जन्म लेने की इच्छा से जीवात्मा मन के सहित पुरुष के वीर्य में प्रवेश कर जाता है तथा क्रिया काल में वीर्य के साथ स्त्री के रज में प्रवेश कर जाता है। स्त्री के गर्भाशय में वीर्य, रज, जीव और मन के संयोग से ‘गर्भ’ की उत्पत्ति होती है। पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज से मन सहित जीव (जीवात्मा) का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं। गर्भाधान का संयोग (काल) कब आता है ? इसे ज्योतिष शास्त्र बखूबी बता रहा है। गर्भ उत्पत्ति की संभावना का योग जब स्त्री की जन्म राशि से अनुपचय (1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12) स्थान में गोचरीय चंद्रमा मंगल द्वारा दृष्ट हो, उस समय स्त्री की रज प्रवृत्ति हो तो ऐसा रजो दर्शन गर्भाधान का कारण बन सकता है अर्थात गर्भाधान संभव होता है। क्योंकि यह ‘ओब्यूटरी एम.सी.’ होती है। इस प्रकार के मासिक चक्र में स्त्री के अण्डाशय में अण्डा बनता है तथा 12वें से 16वें दिन के बीच स्त्री के गर्भाशय में आ जाता है। यह वैज्ञानिकों की मान्यता है, हमारी मान्यता के अनुसार माहवारी शुरु होने के 6वें दिन से लेकर 16वें दिन तक कभी भी अण्डोत्सर्ग हो सकता है। यदि छठवें दिन गर्भाधान हो जाता है तो वह श्रेष्ठ कहलाता है। यह ब्रह्माजी का कथन है। मासिक धर्म प्रारंभ होने से 16 दिनों तक स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल होता है। जिनमें प्रारंभ के 4 दिन निषिद्ध (वर्जित) हैं। इसके पश्चात शेष रात्रियों में गर्भाधान (निषेक) करना चाहिए। पुरुष की राशि से गर्भाधान के योग गर्भ धारण की इच्छुक स्त्री की योग्यता और उसके अनुकूल समय से काम नहीं बनता है। गर्भाधान हेतु पुरुष की योग्यता व उसके अनुकूल समय का होना भी आवश्यक है। शीतज्योतिषि योषितोऽनुपचयस्थाने कुजेनेक्षिते, जातं गर्भफलप्रदं खलु रजः स्यादन्यथा निष्फलम्। दृष्टेऽस्मिन् गुरुणा निजोपचयगे कुर्यान्निषेक पुमान, अत्याज्ये च समूलभे शुभगुणे पर्वादिकालोज्झिते।। जातक पारिजात में आचार्य वैद्यनाथ ने लिखा है – स्त्री की जन्मराशि से अनुपचय स्थानों में चंद्रमा हो तथा मंगल से दृष्ट या संबद्ध हो तब गर्भाधान संभव है, अन्यथा निष्फल होता है। पुरुष की जन्म राशि से उपचय (3, 6,10,11) स्थानों में चंद्र गोचर हो और उसे संतान कारक गुरु देखे तो पुरुष को गर्भाधान में प्रवृत्त होना चाहिए। पुरुष की जन्म राशि से 2, 5, 9वें स्थान में जब गुरु गोचर करता है तब वह गर्भाधान करने में सफल होता है। क्योंकि 2रे स्थान का गुरु 6 और 10वें चंद्रमा को तथा 5वें स्थान से 11वें चंद्रमा को और 9वां गुरु 3रे चंद्रमा को देखेगा। द्वि, पंच, नवम गुरु से गर्भाधान की संभावना का स्थूल आकलन किया जाता है। पुरुष की जन्म राशि से 3, 6, 10, 11वें स्थान में सूर्य का गोचर हो तो गर्भाधान की संभावना रहती है। गर्भाधान का शुभ मुहूर्त एवं लग्न शुद्धि वैद्यनाथ द्वारा कथित उपरोक्त योग गर्भ उत्पत्ति की संभावना के योग हैं। गर्भाधान संस्कार हेतु शुभ या अशुभ मुहूर्त से इसका कोई संबंध नहीं है। गर्भ उत्पत्ति संभावित होने पर ही किसी अच्छे ज्योतिषी से गर्भाधान का मुहूर्त निकलवाना चाहिए। यही हमारी संस्कृति का प्राचीन नियम है। शुभ मुहूर्त में गर्भाधान संस्कार करने से सुंदर, स्वस्थ, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और दीर्घायु संतान का जन्म होता है। इसलिए इस प्रथम संस्कार का महत्व सर्वाधिक है। गर्भाधान संस्कार हेतु स्त्री (पत्नी) की जन्म राशि से चंद्र बल शुद्धि आवश्यक है। जन्म राशि से 4, 8, 12 वां गोचरीय चंद्रमा त्याज्य है। आधान लग्न में भी 4, 8, 12वें चंद्रमा को ग्रहण नहीं करना चाहिए। आधात लग्न में या आधान काल में नीच या शत्रु राशि का चंद्रमा भी त्याज्य है। जन्म लग्न से अष्टम राशि का लग्न त्याज्य है। आघात लग्न का सप्तम स्थान शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होना चाहिए। ऐसा होने से कामसूत्र में वात्स्यायन द्वारा बताये गये सुंदर आसनों का प्रयोग करते हुए प्रेमपूर्वक यौन संपर्क होता है और गर्भाधान सफल होता है। आघात लग्न में गुरु, शुक्र, सूर्य, बुध में से कोई शुभ ग्रह स्थित हो अथवा इनकी लग्न पर दृष्टि हो तो गर्भाधान सफल होता है एवं गर्भ समुचित वृद्धि को प्राप्त होता है तथा होने वाली संतान गुणवान, बुद्धिमान, विद्यावान, भाग्यवान और दीर्घायु होती है। यदि उक्त ग्रह बलवान हो तो उपरोक्त फल पूर्ण रूप से मिलते हैं। गर्भाधान में सूर्य को शुभ ग्रह माना गया है और विषम राशि व विषम नवांश के बुध को ग्रहण नहीं करना चाहिए। आघात लग्न के 3, 5, 9 भाव में यदि सूर्य हो तो गर्भ पुत्र के रूप में विकसित होता है। गर्भाधान के समय लग्न, सूर्य, चंद्र व गुरु बलवान होकर विषम राशि व विषम नवांश में हो तो पुत्र जन्म होता है। यदि ये सब या इनमें से अधिकांश ग्रह सम राशि व सम नवांश में हो तो पुत्री का जन्म होता है। आधान काल में यदि लग्न व चंद्रमा दोनों शुभ युक्त हों या लग्न व चंद्र से 2, 4, 5, 7, 9, 10 में शुभ ग्रह हों, तथा पाप ग्रह 3, 6, 11 में हो और लग्न या चंद्रमा सूर्य से दृष्ट हो तो गर्भ सकुशल रहता है। गर्भाधान संस्कार हेतु अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, तीन उत्तरा, धनिष्ठा, रेवती नक्षत्र प्रशस्त है। पुरुष का जन्म नक्षत्र, निधन तारा (जन्म नक्षत्र से 7, 16, 25वां नक्षत्र) वैधृति, व्यतिपात, मृत्यु योग, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा व सूर्य संक्रांति काल गर्भाधान हेतु वर्जित है। स्त्री के रजोदर्शन से ग्यारहवीं व तेरहवीं रात्रि में भी गर्भाधान का निषेध है। शेष छठवीं रात्रि से 16वीं रात्रि तक लग्न शुद्धि मिलने पर गर्भाधान करें। गर्भ का विकास चरक संहिता के अनुसार – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पंच महाभूतों और इनके गुणों से युक्त हुआ आत्मा गर्भ का रुप ग्रहण करके पहले महिने में अस्पष्ट शरीर वाला होता है। सुश्रुत ने इस अवस्था को ‘कलल’ कहा है। ‘कलल’ भौतिक रूप से रज, वीर्य व अण्डे का संयोग है। गर्भ दूसरे मास में दाना (पिण्ड) हो जाता है। भगवान धन्वंतरि के अनुसार – तीसरे महिने में नेत्रादि इन्द्रियां व हृदय सहित सभी अंग गर्भ में एक साथ उत्पन्न होते हैं। परंतु उनका रूप सूक्ष्म होता है। आचार्य वराह मिहिर के अनुसार – चैथे मास में हड्डी, पांचवें मास में त्वचा, छठे मास में रोम, सातवें मास में चेतना, आठवें मास में भूख-प्यास की अनुभूति, नवें मास में गर्भस्थ शिशु बाहर आने हेतु छटपटाने लगता है और दशवें मास में पके फल की भांति गर्भ से मुक्त होकर बाहर आ जाता है। अर्थात् गर्भ धारण से दशवें महिने में स्वाभाविक (प्राकृतिक) रूप से प्रसव हो जाना चाहिए। गर्भ रक्षा 1. शुक्र, 2. मंगल, 3. गुरु, 4. सूर्य, 5. चंद्रमा, 6. शनि, 7. बुध, 8. आघात लग्न का स्वामी, 9 चंद्रमा, 10. सूर्य ये दस क्रमशः गर्भ मासों के स्वामी (अधिपति) हैं। मासेश जैसी शुभ अशुभ स्थिति में होता है, वैसी ही गर्भस्थ शिशु की स्थिति रहती है। प्रथम, द्वितीय या तृतीय मास में यदि मासेश पाप पीड़ित हो तो उस ग्रह की बलवता या शुभता प्राप्ति के उपाय करना चाहिए। जिससे गर्भ की रक्षा होती है एवं गर्भपात नहीं होता है। गर्भवती स्त्री का आहार-विहार तथा आचार-व्यवहार उत्तम होना चाहिए। गर्भवती स्त्री का स्नेहन (मालिश) और स्वेदन (पसीना निकालना) कर्म करने से गर्भ प्राकृतिक रूप से बढ़ता है। शहद के साथ पुत्रजीवा के आधा तोला चूर्ण को सुबह शाम खाने से गर्भ सुरक्षित रहता है। गर्भवती स्त्री द्वारा घी, दूध का सेवन करने से गर्भ पुष्ट होता है तथा प्रसव भी आसानी से हो जाता है। जिस समय पुरुष (पति) की जन्म राशि से उपचय (3, 6, 10, 11) स्थानों में शुक्ल पक्ष का चंद्रमा भ्रमण कर रहा हो तथा गोचरीय चंद्रमा, गोचर के गुरु या शुक्र से दृष्ट हो तथा सम तिथि को स्वविवाहिता स्त्री में गर्भाधान करने से गुणवान व सुयोग्य पुत्र का आगमन होता है। ऋतुकाल – रजस्राव के प्रथम दिन स्त्री चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र रहती है। इन तीन दिनों में गर्भाधान करने से नरक से आये हुए पापी जीव के शरीर की उत्पत्ति होती है। अतः ऋतुकाल के प्रारंभिक दिनों में गर्भाधान कदापि न करें। मासिक धर्म (ऋतुकाल) के दिनों में स्त्रियों को चाहिए कि वे किसी पुरुष से संपर्क न करें। किसी के पास बैठना और वार्तालाप नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से आने वाली संतान पर अशुभ प्रभाव पड़ता है। वेदांग ज्योतिष में ऋतुकाल की प्रथम चार रात्रियां तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं निन्दित है। ऋतुस्राव के प्रथम 4 दिन-रात रोगप्रद होने के कारण गर्भाधान हेतु वर्जित है। ग्यारहवीं रात्रि में गर्भाधान करने से अधर्माचरण करने वाली कन्या उत्पन्न होती है। तेरहवीं रात्रि के गर्भाधान से मूर्ख, पापाचरण करने वाली, अपने माता-पिता को दुःख, शोक और भय प्रदान करने वाली दुष्ट कन्या का जन्म होता है। कड़वी, खट्टी, तीखी, उष्ण वस्तुओं का सेवन न करके पांच दिन तक मधुर सेवन करें। छठवीं रात्रि में स्नान आदि से शुद्ध होकर गर्भ धारण करना चाहिए। जीव का गर्भ में प्रवेश जीव का मनुष्य योनि में प्रवेश: श्रीमद् भगवद्गीता के अनुसार शुभ-अशुभ कर्म (मिश्रित कर्म) करने वाला राजस प्रकृति (प्रवृत्ति) का जीव मनुष्य योनि में जन्म लेता है। अन्य शास्त्रों के अनुसार चैरासी लाख योनियों में जन्म लेने के बाद जीव को मनुष्य योनि (शरीर) की प्राप्ति होती है। नरक लोक में पापी जीव नरक यातना भुगतने के बाद पाप कर्मों का क्षय होने के उपरांत शुद्ध होकर मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा पुण्यवान पुरुष स्वर्ग लोक में अपने पुण्य कर्मों का सुख भोगता है, पुण्य कर्मों के क्षीण हो जाने के बाद जीव धर्मात्मा या धनवान मनुष्यों के यहां जन्म लेता है। “जन्म प्राप्नोति पुण्यात्मा ग्रहेषूच्चगतेषु च।” पुण्यात्मा पुरुष के जन्म के समय अधिकांश ग्रह अपनी उच्च राशि में होते हैं। एक रात्रि के शुक्र-शोणित योग से कोदो के सदृश्य, पांच रात्रि में बुद्बुद सदृश्य, दस दिन होने पर बदरी फल के समान होता है। तदंतर मांस पिण्डाकार होता हुआ पेशीपिंड अण्डाकार होता है। एक माह में गर्भस्थ भ्रूण पुरुष के हाथ के अंगूठे के अग्रिम पोर के बराबर आकार का हो जाता है। विरोध परिहार: सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि गर्भ मासों की गणना गर्भाधान के दिन से करना चाहिए। पूर्व या पश्चात की एम.सी. तिथि – राजो दर्शन के समय से नहीं। प्रथम माह में मास पिंड में से शिशु के (अर्थात् भ्रूण के) बाहरी मस्तक की रचना हो जाती है। हाथ, पैर आदि अंगों की रचना दूसरे माह में हो जाती है। यह तो स्पष्ट ही है। इसके साथ ही आंख, कान, नाक, मुंह, लिंग और गुदा की रचना भी हो जाती है किंतु इनके छिद्र नहीं खुलते हैं। तीसरा माह पूर्ण होने तक सभी इन्द्रियों के छिद्र खुल जाते हैं। ज्ञानेन्द्रियों की रचना के बाद भी ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है। रूधिर, मेद, मास, मज्जा, हड्डियों व नसों की रचना चैथे माह में हो जाती है। आचार्य वराह मिहिर ने हड्डियों व नसों की चैथे माह में होना तो ठीक बताया है किंतु पांचवें माह में चमड़ी का और छठवें माह में रुधिर व नख (नाखूनों) का निर्माण ठीक नहीं है। क्योंकि इनका निर्माण तो पूर्व में ही हो जाता है। ऐसा गुरुड़ पुराण का मत है। पांचवें माह में क्षुधा-तृष्णा उत्पन्न होना यह पौराणिक मत ठीक नहीं है क्योंकि गर्भस्थ जीव में चेतना और ज्ञान की प्राप्ति सातवें माह में बताई गई है तो फिर इससे पूर्व क्षुधा व तृष्णा (भूख-प्यास) कैसे उत्पन्न होगी ? भूख-प्यास, स्वाद और ओज आदि का आठवें माह में उत्पन्न होना। यह आचार्य वराहमिहिर का मत उपयुक्त व सटीक जान पड़ता है। मासाधिपति के पीड़ित होने पर गर्भपात हो जाता है।- आचार्य वराहमिहिर के अनुसार – मासाधिपतौ निपीड़िते, तत्कालं स्त्रवणं समादिशेत्। अतः गर्भ मास के स्वामी ग्रह के पीड़ित होने पर तत्काल गर्भ स्राव/गर्भपात हो जाता है। जिस मास में मासाधिपति बलवान या शुभ दृष्ट हो उस मास में सुखपूर्वक गर्भ की वृद्धि होती है। जब गोचर मान से मंगल, शुक्र या गुरु पाप ग्रह से दृष्ट या युत होते हैं, अथवा अपनी नीच या शत्रु राशि में होते हैं तो क्रमशः प्रथम, द्वितीय या तृतीय मास में गर्भपात हो जाता है। सबसे अधिक गर्भपात मंगल के कारण ही होते हैं क्योंकि मंगल रक्त का कारक है। अतः गर्भावस्था के प्रारंभ में मंगल ग्रह के शांत्यर्थ उपाय करना चाहिए तथा शुक्रादि कोई ग्रह यदि पाप पीड़ित हो तो उस हेतु भी मंत्र जाप व दान आदि करना चाहिए इससे गर्भ सुरक्षित रहता है। यहां हम एक बात देना चाहते हैं कि सूर्य, चंद्रमा गर्भ को पुष्ट करने वाले और प्रसव कारक होते हैं। गर्भ के तीसरे महिने में जब गर्भस्थ शिशु के लिंगादि अंगों की रचना होती है उस समय गर्भवती स्त्री को यदि सूर्य तत्व वाली औषधियां खिलाई जावे तो सूर्य तत्व की अधिकता के कारण गर्भस्थ शिशु पुरूष लिंगी बन जाता है। गर्भ रक्षा की नवमांस चिकित्सा प्रयत्नपूर्वक गर्भ की रक्षा करना पति-पत्नी दोनों का संयुक्त दायित्व है। गर्भावस्था में स्त्री को काम, क्रोध, लोभ, मोह से बचना चाहिए। गर्भवती स्त्री को अत्यधिक ऊंचे या नीचे स्थानों पर नहीं जाना चाहिए। गर्भवती स्त्री को कठिन यात्राऐं वर्जित है। गर्भवती स्त्री को कठिन आसन या व्यायाम नहीं करना चाहिए। तीखे, खट्टे, कड़वे अत्याधिक गरम पदार्थों का सेवन करने से या गर्भ पर किसी प्रकार का दबाव पड़ने से गर्भ नष्ट हो जाता है। लड़ाई, झगड़ा, शोक, कलह और मैथुन/यौन संपर्क से स्त्री को बचना चाहिए। गर्भस्थ शिशु का स्वास्थ्य अच्छा रहे, उसके शरीर का समुचित विकास होता रहे तथा गर्भवती स्त्री शारीरिक रूप से इतनी सक्षम हो कि उचित समय पर सर्वगुण संपन्न, सुखी व स्वस्थ शिशु को सुखपूर्वक जन्म दे सके। इस हेतु ‘चरक संहिता’ में महर्षि चरक ने नवमास चिकित्सा का विधान वर्णित किया है। प्रथम मास: मासिक धर्म का समय आने पर भी जब ऋतुस्राव न हो तथा गर्भ स्थापना के लक्षण प्रकट होने लगे तब प्रथम मास में गर्भवती स्त्री को सुबह शाम मिश्री मिला हुआ ठंडा दूध पीना चाहिए। द्वितीय मास: द्वितीय मास में दस ग्राम शतावर के मोटे चूर्ण को 200 ग्राम दूध में 200 ग्राम पानी मिलाकर, दस ग्राम मिश्री डालकर धीमी आग पर उबालंे, जब सारा पानी उड़ जाए और दूध ही शेष बचे तो इसे छानकर गुनगुना होने पर घूंट घूंट करके गर्भवती स्त्री पीएं। यह प्रयोग सुबह और रात को सेाने से आधा घंटा पूर्व करेें। तृतीय मास: इस मास में गर्म दूध को ठंडा करके एक चम्मच शुद्ध घी और तीन चम्मच शहद घोलकर सुबह शाम पीना चाहिए। चतुर्थ मास: इस मास में दूध के साथ ताजा मख्खन बीस ग्राम की मात्रा में सुबह शाम सेवन करना चाहिए। पंचम मास: पांचवें मास में सिर्फ दूध व शुद्ध घी का अपनी पाचन शक्ति के अनुरूप सेवन करें। छठा मास: इस मास में द्वितीय मास की भांति क्षीर पाक (शतावर साधित दूध) का सेवन करना चाहिए। सप्तम मास: इस मास में छठे मास का प्रयोग जारी रखें। आठवां मास: इस मास में दूध -दलिया, घी उबालकर शाम के भोजन में भरपेट खाना चाहिए। नवम मास: नवें मास में शतावर साधित तेल में रुई का फाहा भिगोकर रोजाना रात को सोते समय योनि के अंदर गहराई में रख लिया करें। एक माह तक यह प्रयोग करने से प्रसव के समय अधिक कष्ट नहीं होगा और सुखपूर्वक प्रसव हो सकेगा। दसवें माह में जब प्रसव वेदना होने लगे तब वचा (वच) की छाल को एरंड के तेल में घिसकर गर्भवती स्त्री की नाभि के आसपास और नीचे पेडू पर मलें। लगाएं ऐसा करने से सुखपूर्वक नार्मल डिलीवरी होगी। आधुनिक प्रजनन तकनीक भले ही निःसंतान दंपत्ति के लिए आशा की किरण साबित हुई हो। किंतु ‘डिजाईनर किड्स’ टेस्ट ट्यूब बेबी और सेरोगेसी को समाज के अधिकांश लोग यदि अपनाने लग जाये तो आगे आने वाली पीढ़ी में असंवेदना, संस्कारहीनता और अनैतिकता तथा असामाजिकता निश्चित ही बढ़ जायेगी। इसमें कोई संदेह नहीं है। कौन नहीं चाहता कि उसके बच्चे तन-मन से सुंदर, स्वस्थ तथा बुद्धि से तेजस्वी हो। किंतु मात्र चाहने से क्या हो ? बोते तो हम नीम की निबोली है फिर हमें आम के मीठे फल कैसे प्राप्त होंगे ? गांव का अनपढ़ किसान भी भलीभांति जानता है कि कौन सी फसल कब बोना चाहिए। प्रत्येक पशु पक्षी भी किसी विशेष ऋतु काल में ही समागम करते हैं। किंतु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहने वाला मनुष्य आज भूल गया है कि उसे गर्भाधान कब करना चाहिए और कब नहीं। श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न संतान प्राप्ति का भारतीय मनीषियों के पास एक पूरा जन्म विज्ञान था। उनके पास ऐसे अनेक नुस्खे थे जिससे वे शिशु के जन्म से पूर्व ही उसकी प्रोग्रामिंग कर लेते थे फलतः उन्हें मनोवांछित संतान की प्राप्ति हो जाती थी। अथर्ववेदांग ज्योतिष, मनुस्मृति और व्यास सूत्र में बुद्धिमान और प्रतिभाशाली तथा गुण, कर्म, स्वभाव से अच्छी संतान प्राप्ति के सूत्र दिये हुए हैं। उन्हें हम समीक्षात्मक ढंग से सार रूप में लोक कल्याण हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं। 1. जिस दिन स्त्री को रजस्राव (रजोदर्शन) शुरू होता है वह उसके मासिक धर्म का प्रथम दिन/रात कही जाती है। स्त्री के मासिक धर्म के प्रथम दिन से लेकर सोलहवें दिन तक का स्वाभाविक ऋतुकाल माना गया है। ऋतुकाल में ही गर्भाधान करें। 2. ऋतुकाल की प्रथम चार रात्रियां रोगकारक होने के कारण निषिद्ध हैं। इसी तरह ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निंदित है। अतः इन छः रात्रियों को छोड़कर शेष दस रात्रियों में ही गर्भाधान करें। इन दस रात्रियों में भी यदि कोई पर्व-व्रतादि हो तो भी समागम न करें। 3. उपरोक्त विधि से चयन की गई रात्रियों के अलावा शेष समय पति-पत्नी संयम से रहें। क्योंकि ब्रह्मचारी का वीर्य ही श्रेष्ठ होता है, कामी पुरूषों का नहीं और श्रेष्ठ बीजों से ही श्रेष्ठ फलों की उत्पत्ति होती है। 4. गर्भाधान हेतु ऋषियों ने रात्रि ही महत्वपूर्ण मानी है। अतः रात्रि के द्वितीय प्रहर (10 से 1 बजे) में ही समागम करें। ऐतरेयोपनिषद् के अनुसार- ‘दिन में यौन संपर्क स्थापित से प्राण क्षीण होते हैं’। इसी उपनिषद में प्रदोष काल अर्थात् गोधूली बेला भी यौन संपर्क हेतु निषिद्ध कही गई है। 5. शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ तथा निरोगी, बुद्धिमान और श्रेष्ठ संतान चाहने वाली दंपत्ति को चाहिए कि वह गर्भकाल/गर्भावस्था में यौन संपर्क कदापि न करें। अन्यथा होने वाली संतान जीवन भर काम वासना से त्रस्त रहेगी तथा उसे किसी भी प्रकार का शारीरिक मानसिक रोग/विकृति हो सकती है। 6. संस्कारवान और सच्चरित्र संतान की कामना वाली गर्भवती स्त्री को चाहिए वह गर्भावस्था के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष आदि विकारों का परित्याग कर दे। शुभ आचरण करें और प्रसन्नचित रहें। किस रात्रि के गर्भ से कैसी संतान होगी ? चैथी रात्रि में गर्भधारण करने से जो पुत्र पैदा होता है, वह अल्पायु, गुणों से रहित, दुःखी और दरिद्री होता है। पांचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़कियां ही पैदा करेगी। छठवीं रात्रि के गर्भ से उत्पन्न पुत्र मध्यम आयु (32-64 वर्ष) का होगा। सातवीं रात्रि के गर्भ से उत्पन्न कन्या अल्पायु और बांझ होगी। आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र सौभाग्यशाली और ऐश्वर्यवान होगा। नौवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती और ऐश्वर्यशालिनी कन्या उत्पन्न होती है। दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर (प्रवीण) पुत्र का जन्म होता है। ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से अधर्माचरण करने वाली चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है। बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरूषोत्तम/सर्वोत्तम पुत्र का जन्म होता है। तेरहवीं रात्रि के गर्भ से मूर्ख, पापाचरण करने वाली, दुःख चिंता और भय देने वाली सर्वदुष्टा पुत्री का जन्म होता है। ऐसी पुत्री वर्णशंकर कोख वाली होती है जो विजातीय विवाह करती है जिससे परंपरागत जाति, कुल, धर्म नष्ट हो जाते हैं। चैदहवीं रात्रि के गर्भ से जो पुत्र पैदा होता है तो वह पिता के समान धर्मात्मा, कृतज्ञ, स्वयं पर नियंत्रण रखने वाला, तपस्वी और अपनी विद्या बुद्धि से संसार पर शासन करने वाला होता है। पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से राजकुमारी के समान सुंदर, परम सौभाग्यवती और सुखों को भोगने वाली तथा पतिव्रता कन्या उत्पन्न होती है। सोलहवीं रात्रि के गर्भ से विद्वान, सत्यभाषी, जितेंद्रिय एवं सबका पालन करने वाला सर्वगुण संपन्न पुत्र जन्म लेता है। Regards Avinash Astrolok is one of the best astrology institute where you can learn vedic astrology, marriage astrology, nadi astrology, horoscope matching through live vedic astrology classes. 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सूर्य का विभिन्न भावों में गोचर फल

भारतीय ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा कहा जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि भारतीय ज्योतिष में सभी गणना मुख्य रूप से सूर्य को आधार मानकर सूर्योदय के समय से की जाती हैं।सूर्य को पृथक्कारी ग्रह के रूप में भी राहु और शनि की तरह देखा जाता है। मतलब कि इसकी दृष्टि जिस भाव पर होगी उससे जातक को किसी ना किसी तरीके से दूर,अलग या खिन्न करेगा।सूर्य की एक ही दृष्टि होती है सातवीं दृष्टि ।इसके अलावा जिस राशि पर स्थित है उसमें मित्र राशि पर होने पर जातक को अनुकूल एवम् शत्रु राशि में होने पर प्रतिकूल प्रभाव देता है।हमने देखा है कि हमारे लिये कोई कोई महीने बहुत ही कष्ट दायक होते हैं तो कुछ बहुत ही अच्छे होते हैं।मुख्यतः यह अन्य ग्रहों की तरह सूर्य के भी बारह राशियों में से किसी एक राशि से दूसरी राशि में जाने के कारण होता है। किसी भी ग्रह का एक राशि से दूसरी राशि में परिवर्तन या गमन ही गोचर कहलाता है। जैसे 14 जनवरी को सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश/ गमन करते हैं। इसे ही हम मकर संक्रान्ति कहते हैं क्योंकि ये सूर्य की संक्रान्ति है। सूर्य एक राशि में पूरे एक महीने रहते हैं। इस तरह बारह महीने या साल भर में अपना मेष राशि से लेकर मीन राशि तक सीधे क्रम में ही पूरी बारह राशियों का भ्रमण/गोचर पूरा कर लेते हैं। सूर्य और चंद्रमा कभी भी वक्री नही होते है ।वक्री मतलब है।उदाहरण के तौर पर पहली तीन राशियाँ है मेष,वृषभ और मिथुन।मान लीजिए कोई ग्रह है वृषभ राशि में तो यदि ग्रह राशि परिवर्तन करके मेष राशि में चला जाये तो ये राशियों के सीधे क्रम में ना होकर उल्टे क्रम में है।अतः ग्रह की चाल वक्री कहलायेगी।जबकि सीधे क्रम से राशि बदलकर यदि वह ग्रह वृषभ राशि से मिथुन राशि में जायेगा तो सीधे क्रम में चलने के कारण ये चाल मार्गी कहलाती है। राहु और केतु हमेशा उल्टे क्रम में ही चलते हैं। अतः ये दोनों हमेशा वक्री ही रहते हैं।मार्गी कभी नही होते हैं। अब मैं आपको बता रहा हूं कि जब सूर्य का गोचर विभिन्न राशियों में होता है और आपकी कुंडली में जन्मराशि से जिस भी भाव में पहुंचता है तो किस भाव में किस प्रकार का गोचर फल देगा *लग्न या जन्म राशि से सूर्य प्रथम भाव में गमन करता है तो शारीरिक कष्ट, पति-पत्नी की चिंता, धन का व्यय व व्यर्थ परिश्रम कराता है। * दूसरे भाव में सूर्य रोग,धन हानि,चिंता-कलह का कारण बनता है। * तीसरे भाव में पराक्रम, भाग्य वृद्धि, शत्रुओं पर विजय,उत्सव एवं शुभ कार्यक्रम में शिरकत कराता है। * चौथे भाव में राज्य भय,माता को कष्ट, पिता से विवाद,कार्यों में बाधा और सुख में कमी करता है। * पंचम भाव में धन हानि,मन में विचलन ,बच्चों की चिंता इत्यादि फल देता है। * छठे भाव में रोग से मुक्ति, शत्रुओं पर जीत,धन लाभ,यात्रा और उन्नति के अवसर देता है। * सातवें भाव में उदर-विकार,दांपत्य में तनाव, अपयश,आर्थिक तंगी व मानसिक कष्ट देता है। *अष्टम भाव का सूर्य धन-हानि,मानसिक अस्थिरता, दुर्घटना, राज्य-हानि व रोग प्रदान करता है। * नवम भाव का सूर्य व्यर्थ भागदौड़ ,असफलता व अपयश का सामना कराता है। * दशम भाव में सुखों में वृद्धि, कार्यस्थल में पदोन्नति, उपहार-लाटरी,भ्रमण आदि प्रदान करता है। * ग्यारहवें भाव में विद्या, लाभ,संतान-सुख,धन-लाभ,स्वास्थ्य-लाभ और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। *बारहवें भाव में व्यर्थ खर्च, शारीरिक कष्ट, विश्वास घात,राज्य भय एवं हानि का सामना कराता है। * सटीक विश्लेषण के लिये किसी भी जातक की कुंडली में अन्य ग्रहों की स्थितियां और उनके गोचर फल देखकर ही बताया जा सकता है। If you are interested in writing articles related to astrology then do register at – https://astrolok.in/my-profile/register/ or contact at astrolok.vedic@gmail.com
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Rahu :The Demon with a Difference Part - 3

RAHU PART 3

In continuation from part 2 - 

https://www.astrolok.in/index.php/adminpanel/post_details/36389 (Part 1)

https://www.astrolok.in/index.php/adminpanel/post_details/36391 (Part 2)


As the native becomes more and more self obsessed he/she slips away into depression. If the chart favours native sulks away into extreme depression and starts hallucinating things such as sighting ofspirits, ghosts, being bribed by the devil etc. 

Hence, it's clear why Rahu MD native usually complains of supernatural intervention in their lives. Some natives tell stories of UFO and alien abduction too. If not treated these natives become suicidal.

As natives are already suffering from psychological problems they try to find solace in escaping from the reality. This escapade can be found in addiction of alcohol, gambling, Derby, smoking or drugs abuse. Other forms of addiction can be found in video games, social media obsession and addiction to adult content found on Web.

As Rahu rules the virtual world, online love affairs, online gambling addiction can lead the native to become a victim of online frauds eventually increasing his melancholy mental health.

Sometimes Rahu if in milder malefic state then the native tends to escape reality by imagining scenes in their minds and living in a world of their own. Such escapades never change the reality but makes native "unworthy" in the eyes of society.

People take them as sluggish and stupid or sometimes people can never understand what kind of a person the native actually is. On the spiritual side Rahu tempts a native to question everything.

He is drawn towards atheism. As he loses touch, with the divinity making him weaker spiritually. Thus, Rahu drains away the native physically, psychologically and spiritually. The above mentioned things are all conditioned to the individual charts.

The conditions mentioned are mild to extreme i.e. common to rarest. However, everything has a positive side too. First of all, as I said previously Rahu is not a villain. We can steer all the negativity into practical use if we can synchronise with Rahu. Cont'd. 

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