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क्या इच्छा दुःखों का कारण है ?

क्या इच्छा दुःखों का कारण है ?

क्या इच्छा दुःखों का कारण है? आपने पढ़ा होगा और सुना भी होगा की "इच्छा ही दु:खों का कारण है" पर क्या वास्तव में है? सही मायने में हम इच्छा क्या कर रहे हैं- हम हमेशा केवल उस चीज की इच्छा करते है जिसे हम जानते है। बहुत से लोग दिन रात ईश्वर से पैसा ,शोहरत, नाम, तरक्की या कोई भौतिक सुख की वस्तुएं मांगने में लगे रहते है। और यह चीजे उन्हें अपने आसपास के वातावरण में घटित हो रही घटनाओं से प्रेरित हो रही है। हम सभी अपने जीवन में सुरक्षा चाहते है चाहे वो आर्थिक हो सामाजिक हो या भौतिक। हम धर्म का सहारा भी इसी लिए ले रहे है क्योंकि हमें बताया गया है है ईश्वर आपकी इच्छा पूरी करेगा। संसार मे अधिकतर लोग प्रार्थना इसलिए करते है कि उनका जीवन सुरक्षित रह सके अपने भीतर के भय से। इंसान जो नही है वैसा बनने के लिए इच्छा किये जा रहा है और खुद की पहचान खो रहा है। और अधिकांश लोग अपने लक्ष्य में फेल हो रहेहै क्योंकि वो अपना काम सही तरीके से करनेकी बजाय ईश्वरीय शक्ति पर निर्भर हो रहे है। लोग सही काम की तलाश में लगे हुए है जबकि दुनिया मे सही काम जैसा कुछ है ही नही जबकि हमे तो ये सोचना चाहिए कि जो भी कम हम कर रहे है उसे करने का सही तरीका क्या है? और जिस दिन हम ये जान जाएंगे उस दिन हमे अपना काम ही सही लगने लगेगा न कि किसी और का। इच्छाओं ने ही भूत, वर्तमान व भविष्य जैसी चीजें बनाई है। क्योंकि आप कुछ इच्छा कर रहे है मतलब आप भविष्य के बारे में सोच रहे है । भविष्य की तुलना करने के लिए हम भूतकाल को याद करते रहते है। जिस कारण हमारा जीवन बहुत व भविष्य में ही फंस के राह जाता है और जो वर्तमान है उसपर हम केंद्रित हो ही नही पाते है। इच्छाओं को कम करें या बढ़ाएं इच्छाएं किसी भी विषय के साथ हो सकती है य्या बिना किसी विषय के भी। अगर हम बिना विषय के इच्छा उत्पन्न करने में सक्षम हो गए तो हम पाएंगे जो हमारे जीवन में होना चाहिए वो बिना आपके सोचे ही हो रहा है। इसके लिये आपको सोचने व किसी से मांगने की जरूरत नही होगी। वास्तव में इच्छा एक प्रकार की ऊर्जा है। जिसे हम इधर उधर की चीजों के पीछे पागल होकर व्यर्थ खर्च कर रहे है। इच्छा करने में कोई बुराई नही है । अगर हम बिना विषय के इच्छाएं करने लगे तो हमारे जीवन मे वो चीजे भी घटित होने लगेंगी जिनकी हमने कभी कल्पना भी नही करी है। इच्छा करें या संतोष रखे संतोष केवल वही व्यक्ति रख सकते है जो स्वयं को जीवन मे हर हुआ मैन चुके है। जब हम किसी चीज से डर जाते है तो हम वहां संतोष की बात करते है। युवावस्था में सब जोश से भरे होते है बहुत सी असंभव चीजो के लिए भी सोचते है उस वक्त संतोष जैसा कुछ नही होता । किन्तु जैसे जैसे हम वृद्ध होते है हमे सब चीजों से भय लगने लगे जाता है तो हम संतोष की बात करने लगते है। संतोष का अर्थ है कि कहीं न कहीं हम मौजूदा स्थिति को बनाये रखना व्हहते है। वर्तमान से नीचे की स्थिति में नही जाना चाहते। अब आप कहेंगे कि हमने तो वर्षो से यही सुना है कि जो मील उसमे खुश रहना सीखो। तो आपको ये जानना होगा कि हमे जो बजी मिला है उसका हमारी खुशी से लेना देना नही है। हमने जो संसाधन इक्कठे किये है वो हमारी जरूरतों व क्रियाकलापों की बदौलत है।हमने हमारी खुशी इन चीजों से जोड़ ली है। अगर हमारे जीवन मे आनंद नही होगा तभी हम संतोष की बात करेंगे। अगर आप बेहद आनंद की स्थिति में होंगे तो आपको अपना जीवन बहुत छोटा लगेगा आप संतोष की बात तो बिल्कुल नही करेंगे। वही आप बीमार हो या कष्ट में हो तो आप अपने जीवन को बहुत लंबा पाएंगे और संतोष की बातें करने लगेंगे। तो खुद को हर वक्त मस्ती में रहने दें। हम महज कुछ विशेष चीजो को ही मस्ती की चीजें मैन चुके है। जबकि महज सांस लेना भी अपने आप मे मस्ती की बात है। इसका एहसास आप 2 मिनट सांस रोक कर कर सकते है। किसी कार्य विशेष को मस्ती का नाम न दें बल्कि हम जो भी काम कर रहे है उसमें मस्ती ढूंढे। आपका शरीर, मन व ऊर्जा आपसे किस स्तर पर निर्देश ले रही हैं वही तय करेंगी कि ये सब आपके कितने नियंत्रण में है। विषयरहित इच्छाएं रखें व जीवन को मस्ती के साथ जीएं। अंकिता गोस्वामी ज्योतिषतत्वं 8949848820 If you are interested in writing articles related to astrology then do register at – https://astrolok.in/my-profile/register/ or contact at astrolok.vedic@gmail.com

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