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जाने ज्योतिष के अनुसार जातक को होने वाले रोग - भाग १

                                           

                                                         ज्योतिष के अनुसार जातक को होने वाले रोग 

ज्योतिष के माध्यम से जातक को होने वाले रोग अर्थात शारीरिक कष्ट की जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है | ज्योतिषीय गणना से जातक के विद्यमान रोग के अलावा जातक को भविष्य में होने वाली बिमारियों के बारे में सचेत करने में आसानी होती है | बशर्ते की आज के युग में चिकित्सा विज्ञानं बहुत उन्नति कर गया है लेकिन वर्तमान चिकित्सा विज्ञानं से किसी भी इंसान की मौजूदा बिमारियों का पता लगाया जा सकता है , वहीँ ज्योतिषीय गणना से भविष्य का भी

हर इंसान की चाहत होती है की वह स्वस्थ रहे | बीमार होने के बाद बिमारियों के ऊपर होने वाले खर्च काफी अधिक होते हैं तथा शारीरिक कष्ट भी , अर्थात ज्योतिषीय सलाह से इंसान अपनी होने वाली बिमारियों से सचेत रहकर काफी हद तक उनसे बच सकता है | ज्योतिषीय उपायों द्वारा विद्यमान अथवा भविष्य में होने वाली बिमारियों से निजात भी पाया जा सकता है |

ग्रह गण और राशियों के द्वारा कफ, पित्तादि दोष किस प्रकार उत्पन्न होते हैं और उन दोषों से रोगों का अनुमान किस प्रकार किया जा सकता है ,अग्रलिखित  हैं |

मस्तिष्क रोग

१. सूर्य अथवा बृहस्पति  लग्न में  हो और मंगल अथवा शनि सप्तमस्थ हो तो जातक उन्माद रोग से पीड़ित होता है |

२. यदि शनि लग्न में और मंगल सप्तम अथवा त्रिकोण में हो तो जातक उन्माद बुद्धि होता है |

३. यदि लग्न धनु के आरम्भ में हो , सूर्य और चन्द्रमा एक साथ होकर लग्न में हो अथवा केंद्र में हो तो जातक उन्माद बुद्धि होता है |

४. यदि जन्मा लग्न मकर, कुम्भ , मीन, अथवा मेष लग्न हो , तथा रवि और चंद्र साथ होकर त्रिकोण में तथा बृहस्पति तृतीय या केंद्र में हो तो जातक उन्माद बुद्धि होता है |

५. यदि चन्द्रमा और बुद्ध केंद्र में हो अथवा सुबह नवमांश के न हों तो जातक अत्यंत भ्रमयुक्त अर्थात सभी बातों में संदेह करने वाला होता है |

६. यदि चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ हो और राहु लग्न से पंचम , अष्टम तथा द्वादश गत हो तो जातक को इस प्रकार का उन्माद होता है जिसमे क्रोधांश अधिक  होता हैं (सनकी होता है )| ऐसा जातक हमेशा कलह-प्रिय होता है |

७. चंद्र, सूर्य और मंगल लग्न में अथवा अष्टम में अथवा पाप ग्रह से दृष्ट हो तो जातक अनेक रोगों से व्यथित होता है | विशेषतः मृगी रोग से पीड़ित होता है |

८. चन्द्रमा और बुद्ध केंद्र में हो और उसपर पाप ग्रह की दृष्टि हो  और पंचम अथवा अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो ऐसे योग वाला जातक मृगी रोग से पीड़ित रहता है |

९. यदि चन्द्रमा शनि के साथ हो और उसपर मंगल की दृष्टि हो तो जातक वावला होता है |

१०.  यदि बुद्ध लग्नेश वा अष्टमेश के साथ हो, अथवा चंद्र लग्नेश अथवा अश्टमेष के साथ हो तो जातक पागल होता है |

११. यदि क्षीण चन्द्रमा शनि के साथ द्वादश भाव में हो तो मूर्छा होती है |

१२. यदि बुद्ध लग्नेश के साथ होकर ६ , ८ या १२ स्थान गत हो तो जातक पागल होता है |

१३. यदि लग्न में पापग्रह हो और चन्द्रमा छठे या अष्टम स्थान में हो तो मूर्छा होती है |

१४. यदि लग्न में चन्द्रमा पापयुक्त हो और ६ या ८ में पापग्रह हो तो मुर्छ रोग होती है |

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